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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 13
ये सम्यक्‌ प्रतिविध्य सर्वजगतो नैरात्म्यकोटिं शिवां तच्चित्तप्रकृतिप्रभास्वरतया क्लेशास्वभावेक्षणात्‌। सर्वत्रानुगतामनावृतधियः पश्यन्ति संबुद्धतां तेभ्यः सत्त्वविशुद्ध्यनन्तविषयज्ञानेक्षणेभ्यो नमः॥
जिन्होंने समग्र प्राणियों के स्वभाव को जान लिया है और नैरात्म्यकोटिरूप शिवस्वरूप को जान लिया है। जिससे उनका चित्त प्रकृति से प्रभास्वर हो गया है तथा क्लेश के स्वभाव के लक्षण से जिनकी बुद्धि सर्वत्र व्यापक हो गयी है, उसी व्यापक बुद्धि से सर्वत्र सम्बुद्धत्व को ही देखते हैं, ऐसे सत्त्वो के विशुद्धि अनन्त विषय रूप ज्ञान-लक्षण युक्त भगवान्‌ को नमस्कार है।
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