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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 10
अचिन्त्याद्रयनिष्कल्पशुन्द्रिव्यकतिविपक्षतः। यो येन च विरागोऽसौ धर्म: सत्यद्विलक्षण:॥
वे आठ गुण हैं - अचिन्त्य, अद्वय, निर्विकल्प, शुद्धि, अभिव्यक्तिकरण, प्रतिपक्षता, विराग और विराग का कारण। (इस श्लोक से संक्षेप में आठ गुणों से युक्त धर्मरत्न का निर्देश किया गया है।)
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