वह महर्षि जो सर्वज्ञरूप नेत्र को धारण किए हुए हैं। वह मधु भी तथागत धातु ही है। उसे देखकर, उसके चारों ओर मंडराते भ्रमर समूहों को हटाकर वह मधु अपने लिए सञ्चित करते हैं।
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