मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 103
सर्वज्ञचक्षुर्विदितं महर्षिमधूपमं धातुमिमं विलोक्य। तदावृतीनां भ्रमरोपमानामश्लेषमात्यन्तिकमादधाति॥
वह महर्षि जो सर्वज्ञरूप नेत्र को धारण किए हुए हैं। वह मधु भी तथागत धातु ही है। उसे देखकर, उसके चारों ओर मंडराते भ्रमर समूहों को हटाकर वह मधु अपने लिए सञ्चित करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें