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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 14
यथावद्यावदध्यात्मज्ञानदर्शनशुद्ध्धित: | धीमतामविवर्त्यानामनुत्तरगुणैर्गणः॥
जिन बुद्धिमान और अविवर्तनीय (अडिग) महापुरुषों का आध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन यथार्थ रूप से शुद्ध हो जाता है, उनमें अनुत्तर (श्रेष्ठतम) गुणों का समूह प्रकट होता है।
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