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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 12
अतर्क्यत्वादलाप्यत्वादार्यज्ञानादचिन्त्यता। शिवत्वादट्टयाकल्पौ शुद्ध्यादि त्रयमर्कबत्‌॥
संक्षेप में निरोध सत्य का तीन कारणों से अचिन्त्यता उल्लिखित है। वे तीन हैं असत्‌, सत्‌, सदसत्‌ और दोनों का अभाव करके कभी-कभी चार भी कारण होते हैं क्योंकि वह तर्को से परे है। यह सभी प्रकार के शब्दों के द्वारा किए जाने वाले समस्त वाग्व्यबहार से यह तत्त्व बहुत दूर है। इसके क्षेत्र में यह कभी भी नहीं आता है। और आर्यो के द्वारा यह प्रत्यात्मवेद्य है। स्वसंवेदनात्मक मात्र।
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