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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 6
अनादिमध्यनिधनप्रकृतत्वादसंस्कृतम्‌। शान्तधर्मशरीरत्वादनाभोगमिति स्मृतम्‌॥
अनादि अमध्य और अनिधन होने से ही यह असंस्कृत है। शान्त धर्मयुक्त होने से ही इसे अनाभोग कहा गया है। (वे आठ गुण कौन से है? १ - असंस्कृतत्व, २ - अनाभोगत्व, ३ - अपरपत्ययत्व, ४ अभिसंबोधि, ५ - ज्ञान, ६ - करुणा, ७ - शक्ति = स्वार्थ संपत्‌ + परार्थसंपत्‌)
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