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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 107
यद्वत्‌ कङ्लकशालिकोद्रवयवत्रीहिष्वमुक्तं तुषात्‌ सारं खाड्य सुसंस्कृतं न भवति स्वादूपभोज्यं नृणाम्‌॥ तद्वत्‌ क्लेशतुषादनिःसृतवपुः सत्त्वेषु धर्मेश्वरो धर्मप्रीतिरसप्रदो न भवति क्लेशक्षुधार्ते जने॥
जब तब इस संसार में, जब तक कङ्गु, शाली, कोद्रव और धानों के भूषा का अंत करके उनके अन्दर में रह रहे अत्यन्त सुन्दर सार चावल आदि को सुसंस्कृत नहीं किया जाता तब तक वह भोजन स्वादपूर्ण नहीं हो सकता। उसी प्रकार क्लेश रूपी तुष-भूषा से ढके हुए अन्तःस्थित प्रीतिपूर्ण धर्म को नहीं निकाला जाता तब तक धर्म प्रीति रस उपलब्ध नहीं होता जिससे क्लेश क्षुधा की शान्ति भी नहीं होती।
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