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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 96
बुद्धः कुपडो मधु मक्षिकासु तुषेसु साराण्यशुचौ सुवर्णम्‌। निधिः क्षितावल्पफलेऽङ्कुरादि प्रक्लिन्नवस्त्रेषु जिनात्मभावः॥
कुपद्म में बुद्ध, मक्षिकाओं में मधु, तुषा में अन्नों का सार, अशुचि में सुवर्ण, निधि पृथिवी में, अल्पफल में अङ्कुर आदि, इसी प्रकार भिगे हुए वस्त्रो में जिनों का आत्मभाव रहता है।
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