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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 63
चित्तस्य यासौ प्रकृतिः प्रभास्वरान जातु सा द्यौरिव याति विक्रियाम्‌। आगन्तुकै रागमलादिभिस्त्वसाबुपैति संक्लेशमभूतकल्पजैः॥
चित्त की जो प्रकृति प्रभास्वर स्थिति है वह कभी भी विकृत नहीं होती और आकाश के तरह ही रहती है। आगन्तुक राग-मल आदि से कभी भी व्यापृत न होने से संक्लेश अभूत कलपात्मक तत्त्वों से सदा दूर रहता है।
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