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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 116
अम्ब्वादित्यगभस्तिवायुपृथिवीकालाम्बरप्रत्ययैयद्वत्‌ तालफलाम्रकोशविवरादुत्पद्यते पादपः। सत्त्वक्लेशफलत्वगन्तरगतः संबुद्ध बिजाङ्कुर स्तद्वद्ग॒द्धिमुपैति धर्मविटपस्तैस्तैः :॥
जल, सूर्य के किरण, पृथिवी और समय के कारणों से एक नन्हा सा बीज - जो आम, ताल आदि वृक्षों का है, वह क्रमश: बड़ा होकर विशालकाय वृक्ष बन जाता है। उसी प्रकार प्राणियों के अन्दर अविद्या कोश से ढका हुआ संबुद्धत्व का बीज क्रमशः शुभ कारणों के आ जाने पर अङ्कुर होते हुए विशिष्ट धर्म वृक्ष बन जाता है।
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