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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 120
नारी यथा काचिदनाथभूता वसेदनाथावसथे विरूपा। गर्भेण राजश्रियमुद्वहन्ती न सावबुध्येत नृपं स्वकुक्षौ॥
कोई महिला है जो अनाथ हो गई है और किसी अनाथालय में रहती है। अत्यन्त विरूप हो गई है और वह ऊपर से गर्भवती भी है। किन्तु उसके गर्भ में जो बच्चा है वह भावी चक्रवर्ती राजा है किन्तु वह उस राजत्व को नहीं जानती।
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