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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 19
शास्तृशासनशिष्यार्थेरधिकृत्य त्रियानिकान्‌। कारत्रयाधिमुक्तांश्च प्रज्ञप्तम शरणत्रयम्‌॥
शास्ता (बुद्ध), उनके शासन (धर्म) और शिष्यों (संघ) के उद्देश्य से, तथा तीन यानों में प्रवृत्त और तीन प्रकार के कर्मों में श्रद्धा रखने वालों के लिए शरणत्रय (शरणों) का उपदेश किया गया है।
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