अपनी प्रज्ञा द्वारा स्नेहपाश को काटकर अपने में ही समस्त सत्त्वों के स्नेह को समझकर महाकृपा से वह निर्वाण में नहीं जाता है। ऐसा जानकर प्रज्ञा और करुणा से बोधि के प्राप्ति से भी संसार और निर्वाण दोनों में आर्य नहीं जाता है।
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