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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 39
छित्त्वा स्नेहं प्रज्ञयात्मन्यशेषं सत्त्वस्नेहान्‌ नैति शान्तिं कृपावान्‌। निःश्रित्यैवं धीकृपे बोध्युपायौ नोपैत्यार्यः संवृतिं निर्वृतिं वा॥
अपनी प्रज्ञा द्वारा स्नेहपाश को काटकर अपने में ही समस्त सत्त्वों के स्नेह को समझकर महाकृपा से वह निर्वाण में नहीं जाता है। ऐसा जानकर प्रज्ञा और करुणा से बोधि के प्राप्ति से भी संसार और निर्वाण दोनों में आर्य नहीं जाता है।
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