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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 83
तत्र द्वाभ्यामथ द्वाभ्यां द्वाभ्यां द्वाभ्यां यथाक्रमम्‌। पदाभ्यां नित्यताद्यर्थो विज्ञेयोऽसंस्कृते पदे॥
यहाँ पर दो से, फिर दो से, क्रमश: दो और दो पदों से भी नित्यता आदि अर्थ असंस्कृत पद में जानना चाहिए।
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