सर्वलोकव्यतीतोऽसौ न च लोकाद्विनिःसृतः। लोके चरति .लोकार्थमलिप्तो लौकिकैर्मलैः॥
यह सभी लोकों से दूर है किन्तु लोक से निकला हुआ भी नहीं है। लोक के लिए लोक में ही विचरण करते हैं किन्तु लौकिकमल से लिप्त भी नहीं होते।
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