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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 114
यद्वद्रलनिधिर्दरिद्रभवनाभ्यन्तर्गत: स्यान्नरं न ब्रूयादहमस्मि रत्ननिधिरित्येवं न विद्यान्नरः। तद्वद्धर्मनिधिर्मनोगृहगतः सत्त्वा दरिद्रोपमास्तेषां तत्प्रतिलम्भकारणमृषिर्लोके समुत्पद्यते॥
जैसे अति दरिद्र व्यक्ति के घर के भीतर गढा हुआ रत्न समूह कुछ नहीं कहता कि - मैं यहाँ गढा हूँ, और वह व्यक्ति नहीं जान सकता। वैसे ही वह गढा हुआ निधि धर्म है दद्रिता गृहपति समस्त प्राणी हैं, किन्तु उस गृहपति को सत्त्वों को वह धन - धर्म को दिखाने वाले दिव्यदृष्टि सम्पन्न मुनि बुद्ध पुरुष आते हैं।
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