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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 69
धर्मतां प्रतिविच्येमामविकारां जिनात्मजः। दृश्यते यदविद्यान्धैर्जात्यादिषु तददभुतम्‌॥
जिनात्मज बोधिसत्त्व अविकार धर्मता का विवेचन करके, अविद्याअन्धो के द्वारा जाति-जन्म आदि का साक्षात्कार किया जाता है वह बोधिसत्त्वो के लिए अत्यन्त आश्‍चर्यकारक है॥
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