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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 110
दृष्ट्वा मुनिः सत्त्वगुणं तथैव क्लेशेष्वमेध्यप्रतिमेषु मग्नम्‌। तत्क्लेशपङ्कव्यवदानहेतो्धर्माम्बुवर्ष व्यसृजत्‌ प्रजासु॥
इसी प्रकार तथागत ने समग्र प्राणियों में भीतर रह रहे सत्त्व गुण को देखा जो अनेक अशुद्ध क्लेशों के भीतर है, उसे उठाकर, धर्मवर्षा से पवित्र कर जनता को वितरित किया।
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