मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 108
यथा सुवर्ण व्रजतो नरस्य च्युतं भवेत्संकरपूतिधाने। बहूनि तद्वर्षशतानि तस्मिन्‌ तथैव तिष्ठेदविनाशधर्मि॥
कोई व्यक्ति सुवर्ण लेकर कहीं जा रहा है, उसे पता नहीं चला और उसका वह बहुमूल्य सुवर्ण अत्यन्त अपवित्र जगह में गिर गया और हजारों वर्षो तक पडा ही रहा किन्तु उसमें कोई विकार नहीं आया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें