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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 126
नानाविधक्लेशमलोपगूढमसङ्गचक्षुः सुगतात्मभावम्‌। विलोक्य तिर्यक्ष्वपि तद्विमुक्तं प्रत्यभ्युपायं विदधाति तद्वत्‌॥
इसी प्रकार अनेक क्लेश मलों से आवृत सुगतात्म भाव को, किसी असङ्ग एवं दिव्य चक्षु सम्पन्न व्यक्ति ने, देखकर पशु प्राण आदि समस्त संसार को और उन्हें मुक्ति के उपाय को बताते हैं।
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