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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 53
यथा सर्वत्र लोकानामाकाश उदयव्यय:। तथैवासंस्कृते धाताविन्द्रियाणां व्ययोदय:॥
जैसा कि सभी संसार के लिए आकाश का उदय और व्यय होता है उसी प्रकार असंस्कृत धातु में इन्द्रियों का व्यय और उदय देखा गया है।
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