प्रभास्वरत्वं प्रकृतेर्मलानामागन्तुकत्वं च सदावलोक्य। रत्नाकराभं जगदग्रबोधिर्विशोधयत्यावरणेभ्य एवम्॥
मलों की आगन्तुक प्रवृत्ति और अन्दर प्रकृति से ही प्रभास्वर तथागतधातु है। इसे देखकर जगत् के अग्रबोधिसत्त्व इन मलावरणों से सत्त्वो को परिशोधित करते हैं।
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