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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 42
महोदधिरिवामेयगुणरलाक्षयाकरः। प्रदीपवदनिर्भागगुणयुक्तस्वभावतः॥
महोदधि (समुद्र) के तरह ही अनन्त गुण रत्नों का अक्षय खानि है तथा दीप के तरह ही अन्धकार रहित गुणों के स्वभाव से सम्पन्न भी है यह योग।
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