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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 59
अयोनिशोमनस्कारो विज्ञेयो वायुधातुवत्‌। तदमूलाप्रतिष्ठाना प्रकृतिर्व्योमधातुवत्‌॥
अयोनिशमनस्कार को वायु धातु के तरह ही जानना चाहिए। अन्य प्रतिष्ठान उससे अप्रतिष्ठित होते हैं जैसे प्रकृति रूप से ही व्योम धातु के तरह।
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