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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 117
बिम्बं यथा रत्नमयं जिनस्य दुर्गन्धपूत्यम्बरसंनिरुदद्धम्‌। दृष्टवोज्झितं वर्त्मनि देवतास्य मुक्त्यै वदेदध्वगमेतमर्थम्‌॥
रत्नों से बनी हुई भगवान्‌ तथागत की मूर्ति है। वह बहुमूल्य तथा शूद्ध है किन्तु किसी ने उसके “ऊपर अत्यन्त दुर्गन्धित वस्त्र रख दिया या ढक दिया हो। उसे किसी देवता ने देखा और कहा की यह रत्नों की मूर्ति है। तब लोगों ने उस वस्त्र को हटा दिया तब पता चला कि कितनी सुन्दर, पवित्र मूर्ति है।
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