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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 79
अनन्यथात्माक्षयधर्मयोगतो जगच्छरण्योऽनपरान्तकोटितः। सदाद्दयोऽसावविकल्पकत्वतो ऽविनाशधर्माप्यकृतस्वभावतः॥
आत्मक्षय के योग से यथार्थ तत्त्व को समझने वाले तथा जगत्‌ के ही शरण्य हैं क्योंकि आदि और अन्त न होने से, विकल्पविहीन होने से सर्वदा अद्वयरूप हैं, अविनाशी होने पर भी निर्मित स्वभाव वाले नहीं है।
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