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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 109
तद्देवता दिव्यविशुद्धचक्षुर्विलोक्य तत्र प्रवदेन्नरस्य। सुवर्णमस्मिन्नवमग्ररत्नं विशोध्य रत्नेन कुरुष्व कार्यम्‌॥
कोई दिव्य दृष्टि सम्पन्न देवता ने यह देखकर किसी व्यक्ति से कहा देखो वहाँ पर, उस अशुद्ध जगह में सुवर्ण पड़ा है तुम ले लो और अपना कार्य करो, जो नवरत्नो में अग्रस्थानीय है।
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