दोषागन्तुकतायोगाद् गुणप्रकृतियोगतः। यथा पूर्व तथा पश्चादविकारित्वधर्मता॥
आगन्तुक मलों से ही दोष होते हैं जो गुण प्रकृति के योग से ही होते हैं। जैसा पहले था वैसा ही बाद में भी होगा - वह अविकारित्व धर्म ही है।
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