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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 32
चतुर्धावरणं धर्मप्रतिघोऽप्यात्मदर्शनम्‌। संसारदुःखभीरुत्वं सत्त्वार्थ निरपेक्षता॥
चार प्रकार के आवरण, धर्मप्रतिघा, आत्मदर्शन, संसार दुःख की भीरुता, निरपेक्षता - प्राणियों के लिए।
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