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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 52
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितः सत्त्वे तथायं नोपलिप्यते॥
सूक्ष्म एवं व्यापक होते हुए भी आकाश कहीं भी लिप्त नहीं होता उसकी प्रकार यह बुद्ध गुण (धातु) भी कहीं भी लिप्त नहीं होता।
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