वे तीन रत्न हैं। क्योंकि इनका उत्पादन होना ही दुर्लभ है। वे अत्यन्त निर्मल भी हैं। तेजस्वी हैं। संसार के आभूषण हैं। अग्रस्थानीय हैं और निर्विकार भी हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।