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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 22
रत्नानि दुर्लभोत्पादान्‌ निर्मलत्वात्‌ प्रभावतः। लोकालंकारभूतत्वादयग्रत्वान्‌ निर्विकारतः॥
वे तीन रत्न हैं। क्योंकि इनका उत्पादन होना ही दुर्लभ है। वे अत्यन्त निर्मल भी हैं। तेजस्वी हैं। संसार के आभूषण हैं। अग्रस्थानीय हैं और निर्विकार भी हैं।
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