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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 20
त्याज्यत्वान्‌ मोषधर्मत्वादभावात्‌ सभयत्वतः। धर्मो द्विधार्यसंघश्च नात्यन्तं शरणं परम्‌॥
त्यागने योग्य होने से, व्यर्थ धर्म होने से, अभाव होने से, भयमुक्त होने से दो प्रकार का धर्म और आर्य संघ भी अत्यन्त शरण नहीं हो सकते।
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