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अध्याय 4 — चतुर्थ पटल

शिव संहिता
111 श्लोक • केवल अनुवाद
सर्वप्रथम योगाभ्यासी ओंकारमूलक प्राणायाम के द्वारा वायु को कर्षित करके उसे मूलाधार चक्र में स्थापित कर दे। तत्पश्चात् मलद्वार तथा जननेन्द्रिय के मध्यवर्ती योनिस्थान का चेष्टापूर्वक संकोचन करे। अब यहाँ नीचे की पंक्तियों में योनिमुद्रा का विशद वर्णन किया जा रहा है।
ब्रह्मयोनि के मध्य गेंद के समान धवल तथा करोड़ों-करोड़ सूर्य की आभा के सदृश देदीप्यमान एवं करोड़ चन्द्रमाओं के समान शीतलतायुक्त कामदेव का ध्यान धारण करना चाहिए।
उसी के ऊपर सूक्ष्म ज्योति के समान चमकीली, चिद्रूप तथा परमकला के सहित एक ही आत्मा का ध्यान करे, क्योंकि ब्रह्मयोनि के ऊपर सूक्ष्म जयोतिशिखा के रूप में आत्मा की वर्तमानता रहती है। अतः साधक के लिए वही ध्यातव्य है।
प्रत्येक जीव उसी ब्रह्मयोनिपथ से सुषुम्ना नाड़ी मार्ग द्वारा क्रमानुसार लिंगत्रय से गमन करता है। देहधारी में तीन प्रकार के लिंग कहे गये हैं, जैसे - १. स्थूल, २. सूक्ष्म और ३. कारण।
मृत्यु के उपरान्त ये तीनों लिंग अर्थात् स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर नहीं रह जाते है। करोड़ों सूर्य की कांति वाले, करोड़ों चन्द्र की शीतलता वाले, श्वेत तथा रक्त वर्ण वाले परमानन्दरूप एवं अमृत की धारावाही वर्षा करने वाले स्वर्गस्थ अलौकिक कलामृत का पान करके पुनः योनिमण्डल में अवस्थित हो जाता है।
इसके अनन्तर प्राणायाम के द्वारा प्राणवायु ब्रह्मयोनिमार्ग से प्रस्थित होता है। इसे मिथ्या नहीं समझना चाहिए। मैंने उसी ब्रह्मयोनि को प्राणसंज्ञक भी कहा है।
तत्पश्चात् वह जीव कालाग्नि से समन्वित शिवरूप होकर गमन करता हुआ चन्द्रमण्डल में जाकर अमृतपान करता तथा पुनः लौटकर ब्रह्मयोनि में ही अवस्थित हो जाया करता है। इसी बन्ध को योनिमुद्रा कहते हैं। केवल एक अकेले इस बन्ध के करने से प्राणी के लिए इस जगत में कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह जाती है।
इस योनिमुद्रा की सिद्धि होने पर सभी सिद्धियाँ सहज ही आ जाती है।
जो मंत्र छिन्न-भिन्नस्वरूप, कीलित, स्तम्भित, दग्ध, मुंडविहीन, मलिन या अनादृत है अथवा
जो बाल (अल्प प्रभावयुक्त), वृद्ध (समग्र प्रभाव वाले), प्रौढ़ (मध्यम प्रभावशील), यौवनगर्वित (प्रचण्ड स्वभाव वाले), भेदयुक्त (भ्रमान्वित करने वाले) तथा सप्ताहों से निष्क्रिय पड़े हैं।
अथवा ऐसे मन्त्र जो शत्रु के लिए लाभकारी हैं या जो निस्तेज और सत्त्वहीन हैं या जो सत्त्वविहीन होने के साथ-ही-साथ खंडित होकर सैकड़ों टुकड़ों में बिखर गये हैं,
वे सभी मन्त्र उक्त योनिमुद्रा की सिद्धि होने या गुरु द्वारा प्रदत्त उपदेशानुसार कार्य करने पर सिद्ध, प्रभावशाली और मोक्षदाता हो जाते हैं।
योगी के द्वारा मन्त्रोच्चार काल में जो भी मन्त्र शुद्धाशुद्ध रूप से उच्चरित हुआ करते है वे सभी इस योनिमुद्रा के बन्ध से शुद्ध एवं सिद्धिप्रद हो जाते हैं।
अपने जिज्ञासु साधक शिष्य के प्रति गुरु का भी यह कर्तव्य होता है कि वह शिष्य के मन्त्र ग्रहणार्थ उसे इस योनिमुद्रा की दीक्षा देकर उससे इसका अभ्यास सहस्त्रों बार कराता रहे। गुरु को अपने शिष्य से किसी रहस्य का गोपन करना भी उचित नहीं है।
साधक द्वारा सहस्रों जीवहिंसा करने या त्रैलोक्य के समस्त प्राणियों का वध कर डालने पर भी उसे इस मुद्रा के फलस्वरूप पाप में लिप्त नहीं होने पड़ते।
गुरुहन्ता, सुरापानक, चौरकर्मकारक, गुरुशैय्या में रमणकर्ता या इसी प्रकार के अन्य पापों का पातकी साधक भी योनिमुद्रा की सिद्धि पा लेने पर पापकर्मों का फल नहीं भोगता।
मोक्षार्थी साधक का यह आवश्यक कर्म है कि वह नित्यप्रति योनिमुद्रा की साधना में संलग्न रहे।
अभ्यास की सिद्धि मिलने पर अन्य सिद्धियाँ भी मिलती तथा उसी के द्वारा वह मुक्ति पाने का अधिकारी भी बनता है। अभ्यास के द्वारा ही ज्ञानोत्पत्ति, योग में प्रवृत्ति तथा वायुसाधना की सिद्धि भी सम्भव होती है।
अभ्यास के द्वारा ही काल को लाँधकर मृत्युजयी बनने का गौरव भी प्राप्त किया जा सकता है। उसी से वाक्सिद्धि तथा अभीप्सित आचरण की शक्ति भी मिलती है।
अतएव योगाभ्यासी को निरन्तर अभ्यासपरायण रहना चाहिए। यह योनिमुद्रा अतीव गोपनीय होती है। इसे कभी किसी अयोग्य या अनधिकारी व्यक्ति से प्राण के कंठगत हो जाने पर भी नहीं बतलाना चाहिए।
शिवजी कहते हैं कि हे देवि! अब मैं जिस योग-प्रक्रिया का वर्णन करने जा रहा हूँ वह परमोत्कर्षकारक और अत्यन्त सिद्धिप्रदायक है। कठिनता से सिद्ध होने वाली इस दुर्लभ विद्या को गुप्त रखना ही उत्तम सिद्ध पुरुषों का आवश्यक कर्तव्य है।
गुरु के अनुग्रह से अर्थात् उनके कथनानुसार जब सोयी हुई कुंडलिनी जाग उठती है तब सभी पद्म-दलों (चक्रों) तथा सभी गाँठों का भेदन हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कुंडलिनी के साथ सुषुम्नापथ से ब्रह्मरन्ध्र तक प्राणवायु का संचरण सुगमनापूर्वक होने लगता है।
साधक को सभी प्रयासों के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र-विवर को अवरुद्ध कर सुप्तावस्था में पड़ी हुई कुंडलिनी को जगाने के लिए उसे मुद्राभ्यास में लग जाना चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी के जाग्रत न होने तक मोक्षद्वार के कपाट नहीं खुलते।
योगसाधना में प्रमुखतः दश मुद्राएँ बतलायी गयी हैं जो इस प्रकार से है, जैसे - (१) महामुद्रा, (२) महाबन्ध, (३) महावेध, (४) खेचरी मुद्रा, (५) जालंधरबन्ध, (६) मूलबन्ध, (७) विपरीतकरणी मुद्रा,
(८) उड्डीयान बन्ध, (९) वज्रोली मुद्रा तथा (१०) शक्तिचालिनी मुद्रा। उक्त दश प्रकार की मुद्राएँ समस्त मुद्राओं में सर्वोत्तम है।
शिवजी देवी पार्वती के प्रति उन्मुख होकर कहते है - हे प्राणवल्लभे! मैं इस तन्त्र में जिन-जिन मुद्राओं का कथन कर रहा हूँ उन-उन मुद्राओं की साधना से ही सांख्यशास्त्र के प्रवर्तक कपिल आदि प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सिद्धि उपलब्ध की थी।
इस मुद्रा की सम्पन्नता हेतु बाएँ पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को गुदाद्वार और शिश्न के मध्य वाले योनिस्थान (सीवन) से लगाकर आदरपूर्वक गुरु के उपदेशानुसार दबाएँ।
अब दाहिना पैर सीधा फैलाकर उसे दोनों हाथों से पकड़ लें। तदनन्तर शरीर के अन्य नव द्वारों (छिद्रों) को रोककर अपनी ठुड्‌डी को हृदय पर स्थापित कर दें।
पुनः चैतन्यस्वरूप में अपनी चित्तवृत्ति को स्थिर करके वायु की साधना करे। इस महामुद्रा को सभी तन्त्रों में गुप्त रखने का आदेश दिया गया है।
इस मुद्रा का अभ्यास पहले वामांग और पुनः दक्षिणांग से करने का विधान है। संयत चित्त वाले योगाभ्यासी को यह प्राणायाम समान रूप से करणीय है।
इस प्रक्रिया के अपनाने से हतभाग्य योगी भी सिद्धिलाभ कर लेता है, क्योंकि इसकी प्रभावशालिता से सम्पूर्ण नाड़ियों का परिचालन होकर बिन्दु (वीर्य) का स्थिरीकरण हो जाता है।
उक्त प्रकार का अभ्यास जीवन में स्थिरता लाने तथा समस्त पाप-पुंजों का नाश करने हेतु होता है। इसके परिणामस्वरूप उसमें कुंडलिनी को जाग्रत कर प्राण के साथ ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचाने की शक्ति आ जाती है।
इस प्रकार की युक्ति से समग्र रोग उपशमित होकर क्षुधाग्नि का वर्धन होता है। इसके द्वारा शरीर सौन्दर्यमय, स्वच्छ तथा दीप्तिमान हो उठता है और इसके साथ ही जरा-मरण का भी उन्मूलन हो जाता है।
ऐसा साधक समस्त अभिलषित पदार्थों को प्राप्त कर सुखानुभव करता हुआ इन्द्रियदमन में भी सक्षम हो जाता है। इससे मिलने वाले जो भी लाभ कहे गये हैं वे सभी योगाभ्यासी को उपलब्ध होते हैं। इसमें सोच-विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
शिवजी ने पार्वती से कहा - हे देवों द्वारा पूजित देवि! मेरे द्वारा कथित इस मुद्रा को सदैव ही गुप्त रखना चाहिए। इसका कथन उन्हीं लोगों से करना चाहिए जिनमें इसके प्रति अभिरुचि हो। इसकी उपलब्धि से योगिजन भवार्णव (संसार-सागर) से पार हो जाते हैं।
यह मुद्रा कामधेनु गाय (एक स्वर्गीय गाय जो सभी आंकाक्षाओं की पूर्ति कर देती है) के समान सभी फलों को देने वाली है। इसका साधन चुपचाप गुप्त रूप से करना आवश्यक होता है। इसे कभी किसी अनधिकारी या अयोग्य पुरुष से नहीं कहना चाहिए।
तत्पश्चात् पैर को फैलाकर बायीं जाँघ पर दाएँ पैर को स्थापित कर दें और
गुदाद्वार तथा योनिस्थान (सीवन) का संकोचन कर अपानवायु को ऊपर की ओर ले जायें ताकि वह समान वायु के साथ मिलित होकर प्राणवायु को नीचे की ओर उतार दे। अर्थात् प्राणवायु का गमन नीचे की ओर हो जाय
प्राण-अपान को एकीकृत करने हेतु जो प्रबुद्ध साधक इस बन्ध का अभ्यास करता है उसके लिए यह सकलीभूत होता है।
अथवा योगी के नाड़ीजाल से रस-समूह शिरोभाग में प्रवाहित होता है अर्थात् ऊर्ध्व भाग में गमनशील हो उठता है। अतः मुद्रा एवं बन्ध - इन दोनों को ही प्रत्येक अंग द्वारा भली प्रकार से करना आवश्यक हैं।
इस प्रकार का अभ्यास सुषुम्ना नाड़ी में प्राणवायु को स्थिर कर देता है तथा अभ्यासी के शरीर का पुष्टिवर्धन भी करता है।
इसके द्वारा योगाभ्यासी के सभी अस्थि-समूहों तथा बन्धनों का दृढ़ीकरण हो जाता है। ऐसे योगी का हृदय पूरी तरह से परितुष्ट रहता और उसकी अभिलाषाएँ पूरी हो जाती है। वह अपने सर्वाभीष्ट को प्राप्त कर लेता है।
हे त्रिभुवनेश्वरि! महाबन्ध में अवस्थित योगी के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने प्राण-अपान वायु का एकीकरण करके उदर में वायु का संचयन कर ले। तत्पश्चात् वह दोनों कूल्हों के दोनों ओर का ताड़न करे। यह वेध मेरे द्वारा कथित है।
योगियों में उत्तम साधक इस वेध का अभ्यास करता हुआ सुषुम्ना-पथ से ब्रह्मग्रन्थि के भेदन का प्रयास करता है। इस बन्ध में कुशल योगी ही सफल होकर अभीप्सित पदार्थों की उपलब्धि कर सकता है।
जो प्राणी इस श्रेष्ठतम महावेध को गुप्त रखकर निरन्तर अभ्यासशील रहा करता हैं उसे जरा-मरणनाशक वायु की सिद्धि मिल जाती है।
शरीरस्थ षट्चक्रों (आधार, स्वाधिठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध तथा आशाचक्र) में निवसित देवता - गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अग्नि आदि वायु के प्रताड़न से कम्पित हो उठते हैं और महामायास्वरूपा कुंडलिनी शक्ति ब्रह्मस्थान में विलीन हो जाती है। तात्पर्य यह है कि वायु का दबाव वेगपूर्वक पड़ने के फलस्वरूप वे सभी देवता अपने-अपने स्थान का परित्याग का देते हैं जिससे उन स्थानों में प्राणवायु का प्रवेश सुगमता से हो सकता है।
वेध के अभाव में महामुद्रा और महाबन्ध - ये दोनों ही सफल नहीं हो सकते। अतएव योगाभ्यासी को चेष्टापूर्वक इन तीनों ही साधनों का अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए।
जो पुरुष मुद्रा, बन्ध और वेध - इन तीनों का चार बार अभ्यास नित्य करता है वह छह महीने के अभ्यास द्वारा मृत्यु पर विजय पा लेता है। इस विषय में किसी प्रकार का सन्देह करना अनावश्यक होता है।
मुद्रा, बन्ध और वेध - इन तीनों की महत्ता से केवल सिद्ध पुरुष ही परिचित होते हैं, अन्य कोई भी इसे नहीं जान सकता। उक्त तीनों साधनों के ज्ञानोपरान्त साधक सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
सिद्धाभिलाषी साधक के लिए उचित है कि वह ऐसे अभ्यास को सदैव गुप्त ही रखे। इस अभ्यास का कथन किसी सामान्य व्यक्ति से करने पर साधक को सिद्धि मिलना सम्भव नहीं होता।
इस मुद्रा के लिए प्रबुद्ध साधक को दोनों भौंहों के मध्यवर्ती स्थान में अपनी दृष्टि जमाकर उपद्रवविहीन सिद्धासन में बैठना आवश्यक है।
अपनी जीभ को जिह्वाविवर में ले जाकर अमृतरूप उस कूप में अर्थात् तालुमूल में स्थापित कर दें।
अभिप्राय यह है कि जीभ को पलटकर गलघंटिका के पीछे तालु से सटा दें तो यह खेचरी मुद्रा कही जाती है। इसे मैंने भक्तों के हितार्थ ही प्रकाशित किया है।
शिवजी ने कहा - हे देवि! यह मुद्रा मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी है। यह समस्त सिद्धियों की उत्पन्नकर्जी है। इस मुद्रा की साधना करने वाला साधक निश्चित रूप से अमृत-पान करता रहता है। इसके द्वारा साधक को शरीरस्थ देवताओं की सिद्धि मिल जाया करती है और उसे शारीरिक पुष्टता भी प्राप्त होती है। अर्थात् यह खेचरी मुद्रा मृत्युरूप हाथी के वधार्थ सिंह के समान है।
कोई भी योगाभ्यासी पवित्र-अपवित्र या किसी भी अवस्था में क्यों न हो, इस खेचरी मुद्रा की सिद्धि से वह सर्वथैव पावन हो जाता है। यह बात निःसन्देह रूप से सत्य है।
जो साधक इस मुद्रा का अभ्यास क्षणभर भी कर लेता है वह पापरूपी महासागर से पार जाकर देवलोक में सुखोपभोग करता है। तदनन्तर पुनर्जन्म धारघ करने पर उसकी उत्पत्ति किसी कुलीन वंश में होती है।
जो योगाभ्यासी इस खेचरी मुद्रा की साधना करता हुआ स्वस्थ-चित्त से ब्रह्मपरायण रहता है उसे सैकड़ों ब्रह्मा के आयुकाल के विगत हो जाने पर भी वह दीर्घावधि क्षणमात्र ही प्रतीत होती है।
जिस साधक को गुरुदीक्षा के फलस्वरूप यह खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है उसे अनेक प्रकार के पापाचरण में लिप्त रहने पर भी निर्वाणपद की उपलब्धि हो जाती है। अर्थात् इस मुद्रा की साधना से साधक के सभी पापों का उन्मूलन हो जाता है।
शिवजी कहते हैं कि हैं सुरवन्दिते देवि! यह मुद्रा प्राणों से भी अधिक प्रिय है। अतः इसे किसी अयोग्य व्यक्ति से न कहकर सदैव गुप्त ही रखना चाहिए।
इस बन्ध के लिए कंठप्रदेश की शिराओं को आबद्ध कर हृदय से ठुड्डी को मिला लें तो यह जालंधरबन्ध कहा जाता है। यह देवताओं के लिए भी दुर्लभ होता है।
अर्थात् इसके अभ्यासकाल में गले को नीचे झुकाकर ठोड़ी को हृदय से लगाना पड़ता है। सहस्त्रार (सहस्रदल कमल) से क्षरित होने वाले अमृत को नाभिप्रदेश में स्थित जठराग्नि सुखा दिया करता है, किन्तु उसे रोकने के लिए जालन्धरबन्ध करना आवश्यकता होता है। इस बन्ध के द्वारा साधक चन्द्रमा से स्त्रवित होने वाले अमृत का पान स्वयं ही करके कालजयी बन जाता है, क्योंकि जठराग्नि द्वारा अमृत का शोषण कर लेने से ही प्राणी की मृत्यु होती हैं।
इस जालंधरबन्ध के परिणामस्वरूप साधक स्वयं ही अमृतपान करने में सक्षम हो जाता और अमरत्व को प्राप्त करता है। इसके द्वारा वह त्रैलोक्य में सुखपूर्वक विहार करता रहता है।
यह जालन्धरबन्ध सिद्धिप्राप्त पुरुषों के लिए भी सिद्धिदायक प्रमाणित होता है। इसका निरन्तर अभ्यास करने वाला योगी सिद्धिलाभ करता है। (विशेष सावधानी - पूरक प्राणायाम करने के पश्चात् कुम्भक प्राणायाम-काल में प्राणवायु के अवरोधीकरण में इससे सरलता होती है, किन्तु रेचक के समय इसे खोल देना चाहिए। इस बन्ध की प्रक्रिया अत्यन्त सरल है, किन्तु इसमें सावधानी रखने की आवश्यकता है। इसके अभ्यासकाल में रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना चाहिए, अन्यथा उसके टेढ़ी होने की सम्भावना बनी रहती है।)
गुदाद्वार को सिकोड़कर उसे पैर की एड़ी से दबाएँ तथा अपानवायु को बलात् ऊपर की ओर खींचे।
इस क्रिया के द्वारा प्राण-अपान का एकीकरण होता है। इस बन्ध को जरा-मृत्युविनाशक मूलबन्ध के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार प्राण-अपान वायु के मिलन से योनिमुद्रा स्वयं ही सिद्ध हो जाया करती है।
इस योनिमुद्रा की सिद्धि हो जाने पर सिद्ध पुरुषों के लिए इस घरातल पर कोई भी क्स्तु दुष्षप्य नहीं रह जाती। इस बन्ध के अभ्यास से वायु को सहज ही वश में लाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में यदि साधक पद्मासन लगाकर बैठ जाय तो उसमें आकाश-गमन की शक्ति आ जाती है। वह धरती से ऊपर उठकर नभ-मण्डल में विचरने लगता है।
इस प्रकार का उत्तम योगी यदि भवसागर से पार जाने का इच्छुक हो तो उसे इसका अभ्यास किसी निर्जन वन में गुप्त रहकर करना उचित होता है।
यदि कोई योगी अपने शिर को भूमि पर स्थापित कर (शिर के नीचे वस्त्रादि रखकर) अपने दोनों पैरों को आकाश की ओर सीधा खड़ा कर दे तो इसे विपरीतकरणी मुद्रा कहते हैं। इसी को कुछ लोग कपालीमुद्रा भी कहते हैं। इसे अत्यन्त गोपनीय कहा गया है।
इस प्रकार की मुद्रा को प्रतिदिन एक प्रहार (३ घण्टा) तक करने वाला योगी मृत्यु पर भी विजय पा लेता है और सृष्टि के प्रलयान्त में भी उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना पड़ता।
इस भाँति शरीरस्थ अमृत का जो साधक निरन्तर पान करता रहता है वह निश्चय ही सिद्ध हो जाता है। इस बन्ध का अभ्यासी साधक सर्वत्र पूजनीय माना जाता है।
इस बन्ध में नाभिस्थल को नीचे-ऊपर से खींचकर आँतों को पीठ से सटा दिया जाता है। इसको उड्डयानबन्ध कहा जाता है। इसके अभ्यास द्वारा पंचवायुओं (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) का शुद्धिकरण हो जाता है।
इसे बैठकर, खड़े होकर या घुटनों के बल भी किया जा सकता है। यह बन्ध मृत्युरूप हाथी को वश में लाने के लिए सिंह के सदृश है। इसके निरन्तर अभ्यास से यौवन चिरस्थायी रहता है और साधक जन्म-मरण के आवागमन से छूट जाता है।
इस बन्ध का प्रतिदिन चार बार अभ्यास करने वाले साधक के नाभि-प्रदेश का परिशोधन होकर वायु भी परिशोधित हो जाता है।
जो योगी इसका अभ्यास सतत छह मास तक कर लेता है वह मृत्यु को विजित करने में भी सक्षम हो जाता है। इसके अभ्यास से क्षुधाग्नि का दीपन, रसवर्धन एवं शरीरस्थ सम्पूर्ण धातुओं का पुष्टिकरण होता है।
उक्त बन्ध की प्रभावशालितावश योगी का शरीर स्वयमेव ही सिद्धि की ओर अग्रसर होने लगता है जिसके फलस्वरूप उसकी समस्त व्याधियों का नाश हो जाता है।
इसकी प्राप्ति गुरु के अनुग्रह से ही सम्भव होती है। इसकी सिद्धि के निमित्त प्रबुद्ध साधक को शान्तचित्त से किसी एकान्त स्थान में बैठकर साधना करनी चाहिए।
शिवजी पार्वती से कहते हैं कि हे देवि! अब मैं अपने भक्तों के हितार्थ सांसारिक अंधकार (अज्ञान) को मिटाने वाली गुह्य से गुह्यतम वज्रोली मुद्रा का कथन कर रहा हूँ।
इसके अभ्यास से शास्त्रकथित नियमों का अनुपालन न करते हुए भी योगी मोक्ष का अधिकारी बन जाता है तथा गृहस्थाश्रमी घर में रहकर स्वेच्छया सभी भोगों का उपभोक्ता हो जाता है।
इस वज्रोली मुद्रा की साधना से जब भोगी पुरुष भी मुक्तिलाभ कर लेता है तो फिर योगी का क्या कहना है? अर्थात् योगी के लिए तो इसका अभ्यास करणीय कर्म होता है।
सर्वप्रथम साधक को योनिमार्ग से स्त्रवित होने वाले रज को अपने लिंगेन्द्रिय-नाल में खींचकर उसे अपने शरीर में प्रविष्ट कराना चाहिए।
तदनन्तर वीर्यस्खलन को रोककर जननेन्द्रिय-चालन की क्रिया करता रहे। ऐसी अवस्था में यदि अपने स्थान से वीर्यक्षरण हो जाय तो उसे योनिमुद्रा के द्वारा कदाचित् ऊपर की ओर कर्षित कर लेना चाहिए ।
उक्त रीति से वीर्यक्षरण को रोककर उसे ऊपर की ओर खींचे और वाम भाग में स्थिर कर क्षणमात्र के लिए लिंगचालन की क्रिया को रोक दे।
पुनः गुरु के कथनानुसार उसे हुंहुंकार शब्दोच्चार करते हुए दोबारा लिंगचालन क्रिया में संलग्न होना चाहिए। तत्पश्चात् बलपूर्वक अधोवायु का निरोध करके नारी-रज को खींचे। इसी क्रिया को वज्रोली मुद्रा के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार के अभ्यासी साधक को शीघ्र ही योगसिद्धि मिल जाती है तथा वह गुरु चरणकमलानुरागी योगी शरीरस्थ अमृतपान करने में सक्षम बन जाता है।
वीर्य को चन्द्ररूप तथा रज को सूर्यरूप समझकर दोनों का संयोजन कर अपने शरीर में प्रवेशित करा देना चाहिए।
जो साधक बिन्दु (वीर्य) को शिवरूप और रज को शक्तिरूप समझकर दोनों का समयोजन करता है वह दिव्य शरीरवान बन जाता है। शिवशक्ति मायास्वरूपिणी होती है। अर्थात् इस माया का सम्बन्ध ईश्वर के साथ स्थापित करा देने या उसमें विलय कर देने पर ही मोक्षप्राप्ति सम्भव होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बिन्दु और रज का सम्मिलन ही शिव और शक्ति का संगमस्थल है।
इसके अभ्यास की सिद्धि पा लेने वाला साधक भवसागर से पार हो जाता है। वीर्यस्खलन से ही साधक की मृत्यु तथा उसके धारण से जीवन की स्थिरता बनी रहती है। तात्पर्य यह है कि रज-वीर्य के मिलनकाल में वीर्यपात होने से उसकी साधना व्यर्थ चली जाती है। अतः साधक के लिए प्रयत्नपूर्वक वीर्य का अभिरक्षण करना अनिवार्य होता है।
प्रत्येक जीवधारी का जन्म-मरण बिन्दु (वीर्य) के ही आश्रित होता है, क्योंकि शरीरोत्पत्ति में वीर्य ही प्रमुख कारण होता है। अतः इसके धारण से जीवन और स्खलन से मरण सुनिश्चित होता है।
साधक में वीर्यस्खलन की अवरोधक शक्ति आ जाने पर उसके लिए भूमण्डल में कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं होता। अर्थात् वीर्यरक्षण में समस्त सिद्धियाँ समाहित रहती हैं। हे देवि! वीर्यरक्षण के फलस्वरूप ही जगत् में मेरी महत्ता स्थापित है। अतः बिन्दुरक्षण करने वाला साधक भी मेरे ही समान गरिमामय हो जाता है।
सांसारिक जीवों के सुख-दुःख का मूलभूत कारण बिन्दु को ही माना जाता है।
इस प्रकार मूढ़जनों की अज्ञानता का निवारण करने तथा मरणशील मनुष्यों को जरा-मरण के कष्ट से छुड़ाने हेतु यह एक उत्तम साधन का मार्ग है।
इसके अभ्यास से भोगी मनुष्य भी अपनी अभिलषित वस्तुओं को निश्चित रूप से पा लेता है। ऐसे साधक को इस भूतल पर कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं होता।
इस वज्रोली मुद्राभ्यास द्वारा विलासी व्यक्ति अशेष फलभोगों का उपभोग कर निश्चय ही सुखी बन जाता है तथा योगियों द्वारा अभ्यास किये जाने पर उसे निःसंदेह रूप से सम्पूर्ण सिद्धियाँ उपलब्ध हो जाती है। अतः इस मुद्रा का अभ्यास निरन्तर करते रहना चाहिए। इसके द्वारा अशेष अशुभकारी कर्मफलों का भोग भी सुखपूर्वक भुगता जा सकता है।
क्ज्रोलीमुद्रा के भेदानुसार ही सहजोली और अमरोली मुद्रा का नामकरण किया गया है। सभी बातों का सारांश यही है कि योगी को हर प्रकार से बिन्दुधारण करना आवश्यक है।
यदि अपने स्थान से दैवात् बिन्दु (वीर्य) चलित हो जाय और साथ ही रज-वीर्य का सम्मिलन भी हो जाय तो ऐसी अवस्था को अमरोली मुद्रा कहा जाता है। इस मुद्रा में वीर्यवाहिनी नली द्वारा रज-वीर्य का कर्षण किया जाता है।
योगी को वीर्य के चलायमान हो जाने पर योनिमुद्रा की सहायता से उसका अवरोधीकरण करना आवश्यक है। यह सहजोली मुद्रा सभी तन्त्रों में गोपनीय कही गयी है और इसे ही सहजोली मुद्रा के नाम से अभिहित किया जाता है।
अमरोली और सहजोली - इन दोनों मुद्राओं का कार्य एक समान ही होता है, फिर भी इनको दो नामों में विभक्त कर दिया गया है। अतः इन दोनों के अभ्यास प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए।
देवी पार्वती से शिवजी कहते है कि हे प्रिये! मैंने इस मुद्रा का प्रकटन केवल भक्तों के स्नेहार्य किया है, किन्तु यह अत्यन्त गोपनीय है। इसकी गोपनीयता बनाये रखने के लिए इसे हर किसी से नहीं कहना चाहिए।
इस वज्रोली मुद्रा से अधिक गुप्त अन्य कोई साधन नहीं है। इतनी गोपनीय मुद्रा न तो कभी भूतकाल में थी और न हीं भविष्यत् में होगी। अतः इसे प्रबुद्ध साधक सर्वदा ही गुप्त रखे।
साधक को गुरूपदिष्ट विधि के अनुसार स्वमूत्र त्यागकाल में मूत्र को वायु द्वारा बलात् खींचकर धीरे-धीरे निकालना चाहिए। तदनन्तर उसे ऊपर की ओर ले जाने का अभ्यास करे। इस प्रक्रिया के द्वारा बिन्दु-साधना सफल हो जाती है।
यही बिन्दुसाधना आगे चलकर साधक के लिए परम सिद्धिदायिनी बन जाती है। अभिप्राय यह है कि मूत्रत्याग के समय मूत्रधार को धीरे-धीरे निकालना चाहिए।
यदि उक्त क्रिया का अभ्यास योगी छह महीने तक पूरा कर ले तो सैकड़ों स्त्रियों के समागम से भी उसका शुक्रक्षरण न होगा।
हे पार्वति! प्रयत्नपूर्वक इस सिद्धि को प्राप्त कर लेने पर योगी के लिए अन्य किसी सिद्धि की प्राप्ति शेष नहीं रह जाती। अर्थात् उसमें सम्पूर्ण सिद्धियाँ निहित हो जाती है, क्योंकि इसी वीर्यसिद्धि के प्रभाव से मुझे ईश्वरता की उपलब्धि हुई है।
मूलाधार चक्रस्थ कुंडलिनी शक्ति सुषुप्तावस्था में पड़ी रहती है। उस सोयी हुई कुंडलिनी को जागृत करने के लिए प्रबुद्ध साधक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपानवायु पर आरोहण कर उसे बलात् कर्षित करके चालित करे।
यह समस्त शक्तियों की प्रदात्री शक्तिचालित मुद्रा है। प्रतिदिन इस मुद्रा के अभ्यास करते रहने से सभी व्याधियों का विनष्टीकरण होकर आयुवर्धन होता है।
इस शक्तिचालन की मुद्रा के अभ्यास द्वारा सर्पाकृति सुप्त कुंडलिनी जागकर स्वतः ही सुषुम्नानाड़ी से ऊपर चढ़ने लगती है। अतः सिद्धाकांक्षी योगी को इसका अभ्यास नित्यप्रति करते रहना चाहिए।
इसके अभ्यासी का शरीर निःसंदेह रूप से अमरत्व की प्राप्ति कर लेता है और उसे अणिमादिक अष्ट सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, लधिमा, गरिमा, प्राप्य, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) भी हस्तगत हो जाया करती है। (विशेष - इस मुद्रा के अभ्यास-काल में सिद्धासन से बैठकर दोनों हाथ की हथेलियों को भूमि पर टिका देना चाहिए। तदनन्तर हाथों के बल दोनों नितम्बों को भूमि से ऊपर उठाकर बीस या पचीस बार पृथिवी पर ताड़न करें। पुनः प्राणवायु को अवरुद्ध कर मूलबन्ध का प्रयोग कर प्राणवायु को अपानवायु के साथ समायोजित कर दें। इस प्रक्रिया द्वारा कुंडलिनी का जागरण हो जाता है, क्योंकि अपानवायु की ऊष्मा पाकर वह सुप्तावस्या से चलायमान हो जाती है। इस मुद्रा के फलस्वरूप शरीरस्थ बहत्तर सहस्र नाड़ियों का मल संशोधित हो जाता है। इस अभ्यास के द्वारा कुंडलिनी का सुषुम्ना मार्ग में प्रवेश करना सम्भव हो जाता है।)
इस मुद्रा का अभ्यास गुरु के उपदेशानुसार करने वाले प्राणी को मरण-भय नहीं रह जाता। यदि इस मुद्रा को साधक दो मुहूर्त तक कर ले तो शक्ति का हास नहीं होने पाता।
इसका अभ्यास निरन्तर करते रहने पर तो सम्पूर्ण सिद्धियाँ उपलब्ध हो जाती है। अतः किसी उपयुक्त आसन में बैठकर इसका अभ्यास करना योगी के लिए आवश्यक करणीय कर्म होता है।
अतः हे पार्वति! मेरे द्वारा कथित इन दश अभूतपूर्व मुद्राओं के समान अन्य कोई साधना अब तक न हुई है और न तो आगे होने की सम्भावना है। इन दशों मुद्राओं में से क्रमशः एक-एक मुद्रा का अभ्यासी साधक निश्चय ही सिद्ध पुरुष हो जाता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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