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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 32
जीवनं तु कषायस्य पातकानां विनाशनम् । कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम् ।।
उक्त प्रकार का अभ्यास जीवन में स्थिरता लाने तथा समस्त पाप-पुंजों का नाश करने हेतु होता है। इसके परिणामस्वरूप उसमें कुंडलिनी को जाग्रत कर प्राण के साथ ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचाने की शक्ति आ जाती है।
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