इसके अभ्यासी का शरीर निःसंदेह रूप से अमरत्व की प्राप्ति कर लेता है और उसे अणिमादिक अष्ट सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, लधिमा, गरिमा, प्राप्य, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) भी हस्तगत हो जाया करती है। (विशेष - इस मुद्रा के अभ्यास-काल में सिद्धासन से बैठकर दोनों हाथ की हथेलियों को भूमि पर टिका देना चाहिए। तदनन्तर हाथों के बल दोनों नितम्बों को भूमि से ऊपर उठाकर बीस या पचीस बार पृथिवी पर ताड़न करें। पुनः प्राणवायु को अवरुद्ध कर मूलबन्ध का प्रयोग कर प्राणवायु को अपानवायु के साथ समायोजित कर दें। इस प्रक्रिया द्वारा कुंडलिनी का जागरण हो जाता है, क्योंकि अपानवायु की ऊष्मा पाकर वह सुप्तावस्या से चलायमान हो जाती है। इस मुद्रा के फलस्वरूप शरीरस्थ बहत्तर सहस्र नाड़ियों का मल संशोधित हो जाता है। इस अभ्यास के द्वारा कुंडलिनी का सुषुम्ना मार्ग में प्रवेश करना सम्भव हो जाता है।)
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