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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 21
अधुना कथयिष्यामि योगसिद्धिकरं परम् । गोपनीयं सुसिद्धानां योगं परमदुर्लभम् ।।
शिवजी कहते हैं कि हे देवि! अब मैं जिस योग-प्रक्रिया का वर्णन करने जा रहा हूँ वह परमोत्कर्षकारक और अत्यन्त सिद्धिप्रदायक है। कठिनता से सिद्ध होने वाली इस दुर्लभ विद्या को गुप्त रखना ही उत्तम सिद्ध पुरुषों का आवश्यक कर्तव्य है।
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