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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 23
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्वरीम् । ब्रह्मरन्धमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं समाचरेत् ।।
साधक को सभी प्रयासों के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र-विवर को अवरुद्ध कर सुप्तावस्था में पड़ी हुई कुंडलिनी को जगाने के लिए उसे मुद्राभ्यास में लग जाना चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी के जाग्रत न होने तक मोक्षद्वार के कपाट नहीं खुलते।
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