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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 96
दैवाच्चलति चेद्वेगे मेलनं चन्द्रसूर्ययोः । अमरोलिरियं प्रोक्ता लिंगनालेन शोषयेत् ।।
यदि अपने स्थान से दैवात् बिन्दु (वीर्य) चलित हो जाय और साथ ही रज-वीर्य का सम्मिलन भी हो जाय तो ऐसी अवस्था को अमरोली मुद्रा कहा जाता है। इस मुद्रा में वीर्यवाहिनी नली द्वारा रज-वीर्य का कर्षण किया जाता है।
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