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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 6
पुनरेव कुलं गच्छेन्मात्रायोगेन नान्यथा । साच प्राणसमाख्याता हास्मिंस्तन्त्रे मयोदिता ।।
इसके अनन्तर प्राणायाम के द्वारा प्राणवायु ब्रह्मयोनिमार्ग से प्रस्थित होता है। इसे मिथ्या नहीं समझना चाहिए। मैंने उसी ब्रह्मयोनि को प्राणसंज्ञक भी कहा है।
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