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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 102
गुरूपदिष्टमार्गेण प्रत्यहं यः समाचरेत् । बिन्दुसिद्धिर्भवेत्तस्य महासिद्धिप्रदायिका ।।
यही बिन्दुसाधना आगे चलकर साधक के लिए परम सिद्धिदायिनी बन जाती है। अभिप्राय यह है कि मूत्रत्याग के समय मूत्रधार को धीरे-धीरे निकालना चाहिए।
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