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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 5
अमृतं तद्धि स्वर्गस्थं परमानन्दलक्षणम् । श्वेतरक्तं तेजसाक्यं सुधाधाराप्रवर्षिणम् । पीत्वा कुलामृतं दिव्यं पुनरेव विशेत्कुलम् ।।
मृत्यु के उपरान्त ये तीनों लिंग अर्थात् स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर नहीं रह जाते है। करोड़ों सूर्य की कांति वाले, करोड़ों चन्द्र की शीतलता वाले, श्वेत तथा रक्त वर्ण वाले परमानन्दरूप एवं अमृत की धारावाही वर्षा करने वाले स्वर्गस्थ अलौकिक कलामृत का पान करके पुनः योनिमण्डल में अवस्थित हो जाता है।
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