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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 40
नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं यान्ति योगिनः । उभाभ्यां साधयेत्पङ्ख्यामेकैकं सुप्रयत्नतः ।।
अथवा योगी के नाड़ीजाल से रस-समूह शिरोभाग में प्रवाहित होता है अर्थात् ऊर्ध्व भाग में गमनशील हो उठता है। अतः मुद्रा एवं बन्ध - इन दोनों को ही प्रत्येक अंग द्वारा भली प्रकार से करना आवश्यक हैं।
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