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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 82
स्वकं बिन्दुश्च सम्बन्ध्य लिंगचालनमाचरेत् । दैवाच्चलति घेदूर्ध्वं निबद्धो योनिमुद्रया ।।
तदनन्तर वीर्यस्खलन को रोककर जननेन्द्रिय-चालन की क्रिया करता रहे। ऐसी अवस्था में यदि अपने स्थान से वीर्यक्षरण हो जाय तो उसे योनिमुद्रा के द्वारा कदाचित् ऊपर की ओर कर्षित कर लेना चाहिए ।
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