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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 58
गुरूपदेशतो मुद्रां यो वेत्ति खेचरीमिमाम् । नानापापरतो धीमान् स याति परमां गतिम् ।।
जिस साधक को गुरुदीक्षा के फलस्वरूप यह खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है उसे अनेक प्रकार के पापाचरण में लिप्त रहने पर भी निर्वाणपद की उपलब्धि हो जाती है। अर्थात् इस मुद्रा की साधना से साधक के सभी पापों का उन्मूलन हो जाता है।
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