इसके अभ्यास की सिद्धि पा लेने वाला साधक भवसागर से पार हो जाता है। वीर्यस्खलन से ही साधक की मृत्यु तथा उसके धारण से जीवन की स्थिरता बनी रहती है। तात्पर्य यह है कि रज-वीर्य के मिलनकाल में वीर्यपात होने से उसकी साधना व्यर्थ चली जाती है। अतः साधक के लिए प्रयत्नपूर्वक वीर्य का अभिरक्षण करना अनिवार्य होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।