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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 105
आधारकमले सुप्तां चालयेत्कुण्डलीं दृढाम् । अपानवायुनारुह्य बलादाकृष्य बुद्धिमान् । शक्तिचालनमुद्रेयं सर्वशक्तिप्रदायिनी ।।
मूलाधार चक्रस्थ कुंडलिनी शक्ति सुषुप्तावस्था में पड़ी रहती है। उस सोयी हुई कुंडलिनी को जागृत करने के लिए प्रबुद्ध साधक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपानवायु पर आरोहण कर उसे बलात् कर्षित करके चालित करे।
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