तस्योर्ध्वं तु शिखा सूक्ष्मा चिडूपा परमा कला ।
तथा सहितमात्मानमेकीभूतं विचिन्तयेत् ।।
उसी के ऊपर सूक्ष्म ज्योति के समान चमकीली, चिद्रूप तथा परमकला के सहित एक ही आत्मा का ध्यान करे, क्योंकि ब्रह्मयोनि के ऊपर सूक्ष्म जयोतिशिखा के रूप में आत्मा की वर्तमानता रहती है। अतः साधक के लिए वही ध्यातव्य है।
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