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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 62
बन्धेनानेन पीयूषं स्वयं पिबति बुद्धिमान् । अमरत्वचं सम्प्राप्य मोदते भुवनत्रये ।।
इस जालंधरबन्ध के परिणामस्वरूप साधक स्वयं ही अमृतपान करने में सक्षम हो जाता और अमरत्व को प्राप्त करता है। इसके द्वारा वह त्रैलोक्य में सुखपूर्वक विहार करता रहता है।
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