इस जालंधरबन्ध के परिणामस्वरूप साधक स्वयं ही अमृतपान करने में सक्षम हो जाता और अमरत्व को प्राप्त करता है। इसके द्वारा वह त्रैलोक्य में सुखपूर्वक विहार करता रहता है।
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