इसका अभ्यास निरन्तर करते रहने पर तो सम्पूर्ण सिद्धियाँ उपलब्ध हो जाती है। अतः किसी उपयुक्त आसन में बैठकर इसका अभ्यास करना योगी के लिए आवश्यक करणीय कर्म होता है।
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