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शिव संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 1
आदौ पूरकयोगेन स्वाधारे पूरयेन्मनः । गुदमेड्रान्तरे योनिस्तामाकुच्य प्रवर्तते ।।
सर्वप्रथम योगाभ्यासी ओंकारमूलक प्राणायाम के द्वारा वायु को कर्षित करके उसे मूलाधार चक्र में स्थापित कर दे। तत्पश्चात् मलद्वार तथा जननेन्द्रिय के मध्यवर्ती योनिस्थान का चेष्टापूर्वक संकोचन करे। अब यहाँ नीचे की पंक्तियों में योनिमुद्रा का विशद वर्णन किया जा रहा है।
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